कच्चे माल में तीव्र मूल्य वृद्धि और भारी कमी के कारण डिटर्जेंट उद्योग संकट में: 80% लघु उद्योग बंद, हजारों श्रमिक बेरोजगार

कच्चे माल में तीव्र मूल्य वृद्धि और भारी कमी के कारण डिटर्जेंट उद्योग संकट में: 80% लघु उद्योग बंद, हजारों श्रमिक बेरोजगार

गुजरात में साबुन और डिटर्जेंट उद्योग वर्तमान में अपने सबसे खराब दौर से गुजर रहा है। एसिड स्लरी जैसे मुख्य कच्चे माल की कीमतों में 300% तक की भारी वृद्धि और जानबूझकर पैदा की गई कृत्रिम किल्लत के कारण इस पूरे उद्योग पर अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है। गुजरात में डिटर्जेंट पाउडर और साबुन बनाने वाली लगभग 800 से 850 मध्यम एवं लघु उद्योग (MSME) स्तर की स्थानीय फैक्ट्रियां कार्यरत हैं, जिनसे प्रत्यक्ष रूप से 25,000 से 30,000 श्रमिक परिवारों की रोजी-रोटी जुड़ी हुई है। वर्तमान की गंभीर परिस्थितियों के चलते लगभग 80% से 90% इकाइयां बंद हो चुकी हैं, जिसके परिणामस्वरूप 15 से 20 हजार श्रमिक बेरोजगार होकर बर्बादी की कगार पर पहुँच गए हैं।

गुजरात के डिटर्जेंट उद्योग पर आए इस अभूतपूर्व संकट के बारे में गुजरात स्मॉल स्केल डिटर्जेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के चेयरमैन नरेश जैन, सचिव दीपकभाई सुतरिया, संयुक्त सचिव हितेश पित्रोडा, कमेटी सदस्य नीरजभाई और सोप एंड डिटर्जेंट एसोसिएशन गुजरात के चेयरमैन रमेशभाई सुदेशा एवं सचिव हेमांगभाई पटेल ने विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि डिटर्जेंट उद्योग के मुख्य कच्चे माल एसिड स्लरी (LABSA) के उत्पादकों ने वर्तमान वैश्विक युद्ध की स्थिति का गलत फायदा उठाकर बाजार में कृत्रिम कमी पैदा कर दी है। जो कच्चा माल अक्टूबर-नवंबर के दौरान 105 रुपये प्रति किलो था, उसकी कीमत अब स्थानीय इकाइयों के लिए बढ़कर 300 रुपये हो गई है। इसके अतिरिक्त, अन्य रसायनों और पैकिंग सामग्री में भी असहनीय वृद्धि हुई है; उदाहरण के तौर पर जिस साबुन की पैकिंग की कीमत पहले 36 रुपये थी, वह अब बढ़कर 70 रुपये हो गई है।

छोटे उत्पादक मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) को कड़ी टक्कर देते हैं। वर्तमान स्थिति यह है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां 10 रुपये में 200 ग्राम साबुन बेच रही हैं, क्योंकि उनके पास पुराने कच्चे माल का सस्ता स्टॉक उपलब्ध है। दूसरी ओर, छोटे उत्पादकों के लिए बढ़ती लागत के कारण 10 रुपये में 125 ग्राम साबुन बेचना भी घाटे का सौदा साबित हो रहा है। इस पूरी परिस्थिति को देखते हुए उद्योग जगत को यह आशंका है कि यह छोटे उद्योगों को जानबूझकर बंद करवाने का एक बड़ा षड्यंत्र हो सकता है।

डिटर्जेंट उद्योग के विभिन्न संगठनों ने सरकार से विनम्र अपील की है कि यदि MSME इकाइयों के लिए कच्चे माल का 20% से 30% कोटा निर्धारित कर दिया जाए, तो ही इस डूबते हुए उद्योग को पुनर्जीवन मिल सकता है। साथ ही, उन्होंने एसिड स्लरी (LABSA) के बड़े उत्पादकों से भी उम्मीद जताई है कि वे मानवीय दृष्टिकोण रखते हुए उचित दरों पर कच्चे माल की आपूर्ति करें। संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि इस समस्या का जल्द समाधान नहीं हुआ, तो हजारों श्रमिकों की दिवाली इस साल अंधकारमय हो जाएगी।

MumbaiPatrika@1

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