धर्म और विज्ञान के समन्वय से सेवा, संस्कार और राष्ट्र निर्माण के लिए अंतिमधाम चैरिटेबल ट्रस्ट का राष्ट्रीय संकल्प
- नशामुक्त भारत • संस्कारयुक्त युवा पीढ़ी • गौसेवा • वैदिक शिक्षा • आयुर्वेद • ग्राम विकास • बेटियों का स्वास्थ्य • रक्तदान • निःशुल्क मोक्ष सेवा • पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की दिशा में राष्ट्रीय अभियान
अहमदाबाद: भारत हजारों वर्षों से विश्व को आध्यात्मिकता, संस्कार और मानवता का मार्ग दिखाता आ रहा है। लेकिन आज के समय में देश के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई है। एक तरफ भव्य मंदिरों का निर्माण हो रहा है, तो दूसरी तरफ हजारों युवा नशे (ड्रग्स) की लत में फँस रहे हैं। डिप्रेशन और तनाव बढ़ रहा है, परिवार टूट रहे हैं, ग्रामीण क्षेत्रों से युवाओं का पलायन बढ़ रहा है और कई गरीब परिवार शिक्षा, स्वास्थ्य और अंतिम संस्कार जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
इस परिस्थिति में, अंतिमधाम चैरिटेबल ट्रस्ट ने केवल धार्मिक प्रवचनों तक सीमित न रहकर, “धर्म से समाज परिवर्तन” की दिशा में एक व्यापक राष्ट्रीय जन आंदोलन शुरू करने का संकल्प घोषित किया है। प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए पूज्य विरलबापू ने कहा, “धर्म का उद्देश्य केवल मंदिर तक सीमित नहीं है। धर्म का सच्चा अर्थ है – मानव सेवा, संस्कार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण की रक्षा और राष्ट्र निर्माण। भगवान को सोने के मंदिरों की आवश्यकता नहीं है; बल्कि भगवान की संतानों का जीवन सुनहरा होना चाहिए।”
उन्होंने आगे कहा कि आज की नई पीढ़ी अंधविश्वास को नहीं, बल्कि तर्क, विज्ञान और प्रमाण को स्वीकार करती है। इसलिए अब धर्म को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने का समय आ गया है। इसी उद्देश्य से ट्रस्ट द्वारा देश भर में “विज्ञान और धर्म – एक ही सिक्के के दो पहलू” (Two Sides of One Coin) अभियान शुरू किया जाएगा। इसके अंतर्गत गाय के घी का दीपक, यज्ञ, तिलक, आरती, तुलसी, पीपल, उपवास और अन्य वैदिक परंपराओं के पीछे छिपे वैज्ञानिक, स्वास्थ्यवर्धक और सांस्कृतिक पहलुओं को सरल भाषा में छात्रों, युवाओं और समाज के सामने प्रस्तुत किया जाएगा।
पूज्य विरलबापू ने यह भी कहा, “आने वाली सदी का सबसे बड़ा युद्ध सीमाओं पर नहीं, बल्कि नशे, डिप्रेशन, पारिवारिक कलह और संस्कारों के संकट के खिलाफ लड़ा जाएगा। यदि हम आज युवाओं को सही दिशा नहीं देंगे, तो कल केवल अर्थव्यवस्था को ही नहीं, बल्कि पूरे समाज को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।”

इस दिशा में ट्रस्ट द्वारा राज्यव्यापी नशामुक्ति अभियान, योग एवं ध्यान केंद्र, परिवार संस्कार अभियान, मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता, युवा व्यक्तित्व विकास कार्यक्रम और मूल्य आधारित शिक्षा अभियान शुरू किए जाएंगे। गुरु पूर्णिमा के पवित्र अवसर पर एक विशाल रक्तदान महायज्ञ का आयोजन किया जाएगा, जबकि गौरी व्रत के दौरान बेटियों के लिए ‘पोषण और स्वास्थ्य अभियान’ के तहत पौष्टिक आहार का वितरण किया जाएगा।
ट्रस्ट द्वारा आगामी समय में दो ऐतिहासिक सेवा प्रकल्पों की भी घोषणा की गई है: पहला, ‘वृंदावन धाम’ – जहाँ 1000 नंदीयों के लिए आधुनिक नंदीशाला, नर्मदा परिक्रमा करने वालों के लिए अन्नपूर्णा भंडार, वृद्धाश्रम, गौ-आधारित प्राकृतिक खेती और आध्यात्मिक अनुसंधान केंद्र स्थापित किया जाएगा। दूसरा, ‘माँ मकरवाहिनी मोक्षधाम फाउंडेशन (चाणोद)’ – जहाँ पूरे भारत से आने वाले परिवारों के लिए पूरी तरह से निःशुल्क अस्थि विसर्जन सेवा उपलब्ध होगी, ताकि कोई भी परिवार आर्थिक कारणों से अपने धार्मिक कर्तव्यों से वंचित न रहे।
अंतिमधाम आश्रम का विजन: पूज्य विरलबापू के दिव्य मार्गदर्शन में कार्यरत अंतिमधाम आश्रम केवल एक धार्मिक संस्था नहीं है, बल्कि आध्यात्मिकता, मानव सेवा और राष्ट्र निर्माण का जीवंत केंद्र है। आश्रम का मुख्य संकल्प सनातन हिंदू संस्कृति और धर्म के शाश्वत मूल्यों का संरक्षण, ग्राम विकास, गौसेवा, वैदिक शिक्षा, आयुर्वेद, गौ-आधारित प्राकृतिक खेती, पर्यावरण संरक्षण और सर्वांगीण स्वास्थ्य के माध्यम से एक आत्मनिर्भर और संस्कारयुक्त समाज का निर्माण करना है।
आश्रम का कार्य आध्यात्मिकता और विज्ञान के समन्वय पर आधारित है, जिसमें गौमाता, प्रकृति और मानव जाति के बीच संतुलन बनाए रखते हुए समाज को सतत विकास (Sustainable Development) की दिशा में प्रेरित किया जाता है। आश्रम की विभिन्न सेवा गतिविधियाँ संयुक्त राष्ट्र संघ के ‘सतत विकास लक्ष्यों’ (SDGs) की भावना के अनुरूप हैं। विशेष रूप से स्वास्थ्य, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, ग्राम विकास, टिकाऊ कृषि, स्वच्छ पर्यावरण और सामाजिक समानता जैसे क्षेत्रों में आश्रम निरंतर कार्यरत है।
पूज्य विरलबापू ने देश के सभी धार्मिक ट्रस्टों, उद्योगपतियों, शिक्षण संस्थानों, डॉक्टरों, युवाओं और सेवाभावी नागरिकों का खुला आह्वान करते हुए कहा: “अब समय आ गया है कि हम धर्म को केवल मंदिरों की दीवारों तक सीमित न रखें, बल्कि उसे समाज के हर घर तक ले जाएँ। जहाँ एक व्यसनी युवा को नया जीवन मिले, एक गरीब बच्चे को शिक्षा मिले, एक बेटी को पोषण मिले, एक बुजुर्ग को सम्मान मिले, एक किसान आत्मनिर्भर बने और एक गरीब परिवार को अंतिम संस्कार में सहारा मिले — वहीं भगवान का सच्चा निवास है।”
अंत में, उन्होंने देश के लिए एक संकल्प व्यक्त किया: “मंदिर भव्य होने चाहिए, लेकिन हमारे संस्कार उससे भी अधिक भव्य होने चाहिए। गौमाता सुरक्षित होनी चाहिए, किसान समृद्ध होना चाहिए, युवा नशामुक्त होने चाहिए, बेटियाँ स्वस्थ होनी चाहिए, बुजुर्गों को सम्मान मिलना चाहिए और हर गरीब को सम्मान के साथ जीने का अधिकार मिलना चाहिए। यही सच्चा सनातन धर्म है।”
अंतिमधाम आश्रम का संकल्प: “धर्म से संस्कार… संस्कार से सेवा… सेवा से समाज… समाज से समृद्ध राष्ट्र… और समृद्ध राष्ट्र से विश्वकल्याण।”

